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धर्म और प्रेम

निधि सिंह

नीतू अपनी डेस्क पर काम में व्यस्त थी, तभी एक प्यून ने आकर कहा, "नीतू जी, मालिक आपको अपने केबिन में बुला रहे हैं।"
नीतू ने हल्का-सा मुस्कराते हुए उत्तर दिया, "ठीक है, जाती हूं," लेकिन मन में यह सोचने लगी कि विक्रम ने मुझे क्यों बुलाया है। "खैर, बुलाया है तो जाना पड़ेगा," उसने अपने आपको समझाया।
वह विक्रम के ऑफिस में गई और बोली, "सर, आपने मुझे बुलाया?"
"जी हां, बैठिए," विक्रम ने सामने की कुर्सी की ओर इशारा किया। वह बड़े ध्यान से नीतू के चेहरे को देख रहे थे, जहाँ संतोष और आत्मविश्वास की झलक थी। अचानक उन्होंने एक पेपर उसके सामने रखते हुए कहा, "नीतू, आपने दूसरी बार प्रमोशन से इनकार कर दिया। यह मेरे लिए हैरानी की बात है। आज जहाँ ऑफिस में हर कोई पदोन्नति के लिए होड़ लगा रहा है, आप हैं कि फिर से इनकार कर रही हैं। आखिर कारण क्या है?"
नीतू ने सहजता से मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "सर, जीवन में इच्छाएँ अनंत होती हैं। हम सभी इच्छाओं के झूले में झूलते रहते हैं और बड़ी-बड़ी पेंगें लगाते हैं। लेकिन मैं इस पर विश्वास नहीं करती। मैं उतनी ही पेंग लगाती हूँ जितनी कि मुझे आवश्यकता है। मैं जिस पद पर हूँ, उससे खुश हूँ।"
विक्रम ने कहा, "नीतू, मैं आपको लगभग तीन वर्षों से देख रहा हूँ। मैनेजर और अन्य सभी कर्मचारी आपके काम की तारीफ करते हैं। मगर, तरक्की किसे नहीं पसंद? आखिर कोई तो कारण होगा जो आप मुझसे छिपा रही हैं। एक गौरवमयी पद, गाड़ी, बंगले की सहूलियत, बड़ा शहर भला किसको आकर्षित नहीं करता? जिंदगी एक सुनहरे मोड़ पर आपका इंतज़ार कर रही है और आप मोड़ की ओर जाना ही नहीं चाहतीं। अच्छा, एक मालिक और कर्मचारी के नाते नहीं, एक दोस्त के नाते ही सही, कुछ तो बताइए।"
नीतू ने गंभीरता से विक्रम की ओर देखा और फिर बोली, "सर, मुझे अपने माता-पिता के प्रति अपना धर्म आकर्षित करता है। मेरे माता-पिता के विवाह के कई साल बाद मेरा जन्म हुआ और मैं इकलौती संतान हूँ। मम्मी-पापा काफी उम्र के हो चले हैं। आप तो जानते ही हैं, एक पौधा कहीं भी मिट्टी में पनप जाता है, लेकिन वृक्ष नहीं। उन्हें यहाँ रहना पसंद है। यहाँ वे खुशी-खुशी जिंदगी जी रहे हैं। अगर मैं उन्हें नए शहर में ले जाऊं और उनका नया जलवायु अनुकूल नहीं हुआ तो..."
विक्रम ने उनकी बातों को ध्यान से सुना और कहा, "आपकी चिंता समझ में आती है। लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि यह अवसर आपके जीवन में एक नया अध्याय खोल सकता है?"
नीतू ने आगे कहा, "माना बड़ा बंगला, गाड़ी, ओहदा होगा। लेकिन जिनके लिए मेरा जीवन है, यदि वे वहाँ खुश नहीं रह पाएंगे, तो ऐसे ओहदे, बंगले, गाड़ी मेरे लिए बेमानी हैं। इसलिए मैं यह जगह छोड़कर नहीं जा सकती।"
विक्रम ने चुप रहकर कहा, "लेकिन आपने अब तक शादी नहीं की। मैं मीन..."
नीतू ने फिर से अपनी बात रखी, "सर, मैंने कहा ना, मेरे माता-पिता पहले मेरी जिम्मेदारी हैं। आजकल ऐसे लड़के नहीं मिलते जो लड़की के माता-पिता की भी सेवा करने की अनुमति दें। मतलब, लड़केवाले अपने परिवार के आगे भूल जाते हैं कि एक लड़की के भी माता-पिता होते हैं। बस इसलिए।"
"इसलिए आपने अब तक शादी नहीं की?" विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा।
"जी, इसलिए मुझे कोई प्रमोशन नहीं चाहिए, सर," नीतू ने अपने अंतिम निर्णय को स्पष्ट किया।
विक्रम ने नीतू की धर्मनिष्ठा पर मुग्ध होकर कहा, "क्या मुझसे शादी करोगी? मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है। एक अच्छे जीवनसाथी की तलाश में हूँ, जो मुझे अब तक नहीं मिली थी। आपको देखकर लगता है मेरी तलाश पूरी हो गई है। मुझे एक अच्छे जीवनसाथी के साथ-साथ माता-पिता का प्यार भी मिल जाएगा। तो कहिए, मुझे अपना जीवनसाथी बनाओगी?"
यह अप्रत्याशित निवेदन सुनकर नीतू कुछ पल के लिए निःशब्द रह गई। उसने धीरे से हाथ आगे बढ़ाया और विक्रम के हाथ को थाम लिया। अब एकसाथ दो ज़िंदगियाँ एक सुनहरे मोड़ की ओर अग्रसर थीं।
इस नए अध्याय में धर्म और प्रेम का संगम हुआ, जहाँ नीतू ने न केवल अपने माता-पिता की सेवा का संकल्प लिया, बल्कि विक्रम के साथ एक नई यात्रा की शुरुआत भी की। दोनों ने एक-दूसरे को समझा और समर्थन दिया, जिससे उनके रिश्ते में विश्वास और प्रेम की नींव रखी गई।

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