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नरेंद्र की परीक्षा

मुकेश ‘नादान’

रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्र की परीक्षा लेने के लिए ऐसा भाव अपनाया कि वे नरेंद्र के दक्षिणेश्वर आने पर उनकी ओर तनिक भी ध्यान नहीं देते थे। न उनके गीत सुनते और न ही बातचीत करते। नरेंद्र ने भी इसकी कोई परवाह नहीं की। वे दक्षिणेश्वर आते और शिष्यों से हँस-बोलकर लौट जाते। प्रतापचंद्र हाजरा से नरेंद्र की काफी घनिष्ठता हो गई थी।
इस तरह नरेंद्र को वहाँ आते-आते करीब एक माह हो गया।
एक दिन हाजरा से बात करने के पश्चात्‌ नरेंद्र कुछ देर के लिए रामकृष्ण के पास जाकर बैठ गए। जब नरेंद्र उठकर जाने लगे, तो रामकृष्ण ने कहा, “जब मैं तुझसे बात नहीं करता, तो यहाँ किसलिए आता है? ”
नरेंद्र ने शांत भाव से कहा, “आपको चाहता हूँ, इसलिए देखने आता हूँ, आपकी बातें सुनने नहीं आता।"
नरेंद्र का उत्तर सुनकर रामकृष्ण आनंद से गद्गद हो उठे।
अपने प्रति रामकृष्ण का इतना प्रेम देखकर एक दिन नरेंद्र ने उनसे उपहास करते हुए कहा, “पुराण में लिखा है, 'एक राजा दिन-रात अपने पालित हिरण की बात सोचते-सोचते मृत्यु को प्राप्त हुआ और अगले जन्म में हिरण बना।
आप मुझसे जितना प्रेम करते हैं, उससे आपकी भी वही गति होगी।”
रामकृष्ण किसी बालक की भाँति चिंतित होकर बोले, “तू ठीक कहता है, ठीक ही तो कहता है, अब क्या होगा?
मैं तुझे देखे बिना नहीं रह सकता।"
रामकृष्ण के मन में संदेह उत्पन्न हो गया। वे तुंत काली मंदिर में माँ के पास गए और कुछ क्षण बाद हँसते हुए लौट आए। उन्होंने नरेंद्र से कहा, “अरे मूर्ख, मैं तेरी बात नहीं मानूँगा। माँ ने कहा है-तू उस नरेंद्र को साक्षात्‌ नारायण मानता है, इसलिए प्रेम करता है। जिस दिन उसके भीतर नारायण नहीं देखेगा, उस दिन उसका मुख देखने की भी तुझे इच्छा नहीं होगी।"
जिन दिनों नरेंद्र की भेंट रामकृष्ण से हुई, तब वे एफ.ए. की परीक्षा दे रहे थे। तब तक उन्होंने पाश्चात्य न्याययिकों के मतवाद का अध्ययन कर लिया था। दक्षिणेश्वर जाते-आते समय भी उन्होंने विज्ञान तथा पाश्चात्य दर्शन का अध्ययन जारी रखा। बी.ए. उत्तीर्ण करते-करते उन्होंने ह्यूम और बेनथैन की नास्तिकता, देकार्त का अहंवाद, डार्विन का विकासबाद, आदर्श समाज की अभिव्यक्ति, स्पिनोजा का अद्वैत। चिद्वस्तुवाद, काम्टे व स्पेंसर का अज्ञेयवाद आदि के संबंध में काफी ज्ञान अर्जित कर लिया था।
जर्मन दार्शनिक के विषय में भी उन्होंने कुछ पढ़ा था। इसके अतिरिक्त वे मेडिकल कॉलेज में जाकर स्नायु व मस्तिष्क की गठन प्रणाली को समझने के लिए व्याख्यान सुनते थे और उन विषयों का अध्ययन भी करते थे।
लेकिन फिर भी उनकी ज्ञान-पिपासा शांत नहीं हुई, अपितु और भी बढ़ती गई।

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