top of page

रिश्तों का सौंदर्य

अर्पित तिवारी

रात का समय था। संजय और निधि अपने कमरे में बैठे, भविष्य की अनिश्चितताओं पर चर्चा कर रहे थे। निधि चिंतित स्वर में संजय से बोली, "देखो संजय, हमें अब बड़े भैया और भाभी से बात करनी ही पड़ेगी। मैं अब यहां रहकर अपना और बेटियों का भविष्य जोखिम में नहीं डाल सकती। समय रहते अलग हो जाना ही बेहतर है ताकि संबंधों में मिठास बनी रहे।"
संजय ने उसकी बात ध्यान से सुनी, लेकिन वह चुप ही रहा। निधि ने आगे कहा, "मैं जानती हूं कि भैया और भाभी हमें कभी अलग नहीं मानते। हमारी बेटियों को भी उन्होंने हमेशा अपने बच्चों जैसा प्यार दिया है। लेकिन अब अर्पित की शादी हो चुकी है, और उसकी पत्नी, किरण, भी आ चुकी है। वो हमें माता-पिता जैसा सम्मान देती है, लेकिन अगली पीढ़ी में एक स्वाभाविक अंतर तो आ ही जाता है। अब हम उनके लिए चाचा-चाची ही रहेंगे। आजकल की लड़कियां खुद के सास-ससुर को निभा लें, तो बहुत बड़ी बात होती है।"
निधि की चिंता स्पष्ट थी, वह नहीं चाहती थी कि उसकी बेटियाँ किरण पर बोझ बनें। उसने फिर कहा, "मैं अपनी बेटियों के भविष्य के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहती।" संजय के दिल में भी कहीं यह चिंता हलचल मचा रही थी, लेकिन उसे भी भैया से अलग होने का विचार सही नहीं लग रहा था।
संजय और विशाल, दो सगे भाई थे, जिन्होंने अपने जीवनभर का साथ निभाया था। उनके कपड़े का एक बड़ा शोरूम था, जो वे मिलकर चलाते थे। विशाल का एकमात्र बेटा, अर्पित, हाल ही में शादी करके घर आया था। संजय की बड़ी बेटी, श्रुति, एमबीए कर रही थी, और छोटी बेटी, पूजा, ग्रेजुएशन के अंतिम वर्ष में थी। दोनों भाइयों और परिवार के बीच असीम स्नेह था, और देवरानी-जेठानी में भी ऐसा प्रेम था कि कोई अंतर समझ नहीं पाता। तीनों बच्चों में भी सगे भाई-बहनों की तरह स्नेह था, परंतु निधि की चिंता भी गलत नहीं थी।
"भविष्य का क्या भरोसा?" निधि ने सोचते हुए कहा। "बेटियों के घर बिना रुपए-पैसे के नहीं रहा जा सकता। भैया की जिम्मेदारी तो खत्म हो चुकी है, लेकिन मेरी जिम्मेदारी अभी बाकी है। मुझे अभी अपनी दोनों बेटियों की पढ़ाई और शादी का इंतजाम करना है।"
संजय ने गहरी सांस लेते हुए कहा, "ठीक है निधि, मैं आज ही भैया से बात करूंगा।" दोनों पति-पत्नी बड़े भैया विशाल के कमरे की ओर बढ़ते हैं, लेकिन जैसे ही दरवाजे के पास पहुंचते हैं, अंदर से बातचीत की आवाजें उन्हें ठिठका देती हैं। विशाल अपने बेटे अर्पित से कह रहे थे, "देखो बेटा, तुम्हें पूरी आज़ादी है कि तुम चाहो तो घर के ऊपर वाले हिस्से में अपनी गृहस्थी बसा लो। ताकि किरण पर हम सब का बोझ न पड़े। लेकिन, जब तक श्रुति और पूजा की शादी नहीं हो जाती, मेरी जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। संजय मेरा दायाँ हाथ है, उसे मैं अकेला कैसे छोड़ सकता हूँ।"
किरण भी बातचीत में शामिल हो जाती है, "पापा, मुझे रिश्ते बोझ नहीं लगते। मुझे दो-दो मां-बाप और दोनों बहनों के साथ रहना ही पसंद है।" विशाल भावुक होकर बोले, "मुझे तुम्हारी सोच पर गर्व है बेटा। अब मैं निश्चिंत हूँ।"
यह सब सुनकर संजय और निधि के मन में ग्लानि भर जाती है। निधि कहती है, "भैया के बारे में गलत सोचना सचमुच 'चांद पर थूकने' जैसा है।" दोनों अपने कमरे में लौट जाते हैं, यह सोचते हुए कि अपने करीबी रिश्तों को खुद की सोच के कारण तोड़ना गलत होता। रिश्तों की यह सुंदरता और आपसी समझ, इन्हीं ने उनके परिवार को एकता के सूत्र में बांध रखा था।

******

Commentaires


bottom of page