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संगीत प्रेमी

मुकेश ‘नादान’

नरेंद्र उन दिनों अपने पिता के घर भोजन करने के लिए केवल दो बार जाया करते थे, और दिन-रात निकट के रामतनु बसु की गली में स्थित नानी के घर रहकर पढ़ा करते थे। वे केवल पढ़ने की खातिर ही यहाँ रहते थे। नरेंद्र अकेले रहना पसंद करते थे। घर पर अनेक लोग थे, बड़ा हल्ला-गुल्ला था, रात में जप-ध्यान में बड़ी बाधा होती थी। नानी के घर पर अधिक लोग नहीं थे। जो दो-एक व्यक्ति थे, उनसे नरेंद्र को कोई बाधा नहीं होती थी। बंधु-बांधवों में जिनकी जब इच्छा होती, यहाँ आ उपस्थित होते। नरेंद्र ने अपने इस अपूर्व कमरे का नाम रखा था-'टं'। किसी को साथ लेकर वहाँ जाने पर कहते, “चलो “टं' में चलें।'
कमरा काफी छोटा था-चौड़ाई चार हाथ, लंबाई प्रायः उसकी दुगुनी। सामान में एक केनवस (मजबूत मोटे कपड़े) की खाट, उस पर मैला छोटा सा एक तकिया। फर्श पर एक फटी बड़ी चटाई बिछी हुई। एक कोने में एक तानपुरा, उसी के समीप एक सितार और एक डुग्गी। डुग्गी कभी इस चटाई पर पड़ी रहती या कभी खाट के नीचे, अथवा कभी खाट के ऊपर रखी रहती। कमरे के एक कोने में एक साधारण हक्का, उसके निकट थोड़ा सा तंबाकू का गुल और राख गिराने के लिए एक मिट्टी का ढक्कन रखे रहते। उन सब के पास ही तंबाकू (पीनी), टिकिया और दियासलाई रखने का एक मिट्टी का पात्र रखा होता। और ताक पर, खाट पर, चटाई के ऊपर, यहाँ-वहाँ पढ़ने की पुस्तकें बिखरी पड़ी रहतीं। एक दीवार में एक रस्सी की अलगनी लगी थी, उस पर धोती, कुरता और एक चादर झूलती थी। कमरे में दो टूटी शीशियाँ रखी थीं, जो हाल ही में वे रोगग्रस्त हुए थे, इसका प्रमाण थीं। कमरे का बिखरे होने का एकमात्र कारण यह था कि उनका इन सब वस्तुओं की ओर कोई ध्यान नहीं था। बचपन से ही उनमें किसी भोग्य वस्तु के प्रति अपने सुख की कामना नहीं दिखाई पड़ती थी।
एक दिन नरेंद्र मनोयोगपूर्वक अध्ययन कर रहे थे। इसी समय किसी मित्र का आगमन हुआ। भोजनादि कर नरेंद्र पढ़ रहे थे। मित्र ने आकर कहा, “भाई, रात में पढ़ना, अभी दो गीत गाओ।” नरेंद्र ने तुंत पाठ्य-पुस्तक समेटकर एक ओर रख दीं। सितार पर सुर बाँधकर नरेंद्र ने गाना शुरू करने के पहले मित्र ने कहा, “तुम डुग्गी ले लो।” मित्र ने कहा, “भाई, मैं तो बजाना जानता नहीं। स्कूल में टेबुल को हथेली से ठोककर बजाता हूँ, तो क्या इसी से तुम्हारे साथ तबला-डुग्गी बजा सकता हूँ।” नरेंद्र ने तुंरत स्वयं थोड़ा बजाकर दिखाया और कहा, “भली-भाँति देख लो।
जरूर बजा सकोगे? कोई कठिन काम नहीं है। ऐसा करते हुए केवल ठेका देते जाओ, इसी से हो जाएगा।” साथ ही गीत का बोल भी कह दिया। दो-एक बार प्रयास कर किसी तरह मित्र ठेका बजाने लगे। गान शुरू हो गया।
ताल-लय में उन्‍नत होकर और उन्मत्त कर नरेंद्र का हृदयस्पर्शी गीत चलने लगा-टप्पा, टप खयाल, धुपद, बँगला, हिंदी, संस्कृत। नए ठेके के समय नरेंद्र ऐसे ही सहज भाव से बोल के साथ ठेका आदि दिखा देते कि एक ही दिन में कव्वाली, एकताला, आड़ाठेका (संगीत का एक ताल विशेष), मध्यमान, यहाँ तक कि सुरफाँक ताल तक उसके दूवारा बजवा लिया। मित्र बीच-बीच में चिलम भरकर नरेंद्र को पिलाता और स्वयं पीता। यह केवल इसलिए कि तबला बजाने के कार्य में थोड़ा अवकाश नहीं लेने पर हाथ टूट जाने का भय था। किंतु नरेंद्र के गान में विराम नहीं। हिंदी का गीत होने पर नरेंद्र उसका अर्थ कहता-दिन कहाँ से बीत गया पता ही नहीं। शाम हो आई, घर का नौकर एक टिमटिमाता दीया रख गया। क्रमश: रात के दस बजे दोनों व्यक्तियों को होश होने पर उन दिनों के नियमानुसार विदा लेकर नरेंद्र खाना खाने पिता के घर चला गया। उनके मित्र ने अपने घर के लिए प्रस्थान किया।
इस प्रकार पढ़ने के समय नरेंद्र को कितनी बाधाएँ होती थीं, कहा नहीं जा सकता। किंतु कितनी ही बाधा क्यों न हो, नरेंद्र निर्विकार रहता था।

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